विवाह: एक सुसज्जित कारावास

 १. संस्था का मुखौटा

बाज़ार में बिकते रिश्तों का, क्या कोई मोल चुकाएगा?

जो रूहानी संगम था, उसे क्या कानून बचाएगा?

शादी एक अनुबंध है, एक दस्तखत, एक रस्म पुरानी,

दो स्वतंत्र प्राणों को बाँधने की, यह एक चाल सयानी।

हमने प्रेम को नाम दिया, ताकि हम उस पर हक जता सकें,

हमने दीवारें खड़ी कीं, ताकि हम दुनिया को दिखा सकें।

पर ओशो कहते हैं—प्रेम तो एक खुला आकाश है,

और विवाह? वह तो बस एक झूठी सुरक्षा का आभास है।

२. सुरक्षा का डर

हम डरे हुए लोग हैं, हमें कल की बड़ी चिंता है,

इसीलिए हमने 'पति' और 'पत्नी' का जाल बुना है।

जहाँ सुरक्षा आती है, वहाँ ताज़गी मर जाती है,

पवित्रता के नाम पर, अक्सर रूह छटपटाती है।

जब प्रेम मर जाता है, तब संस्था खड़ी रहती है,

झूठी मुस्कानों के पीछे, एक घुटन चुपचाप बहती है।

शादी—एक फर्जी समझौता, समाज का एक पहरा है,

जहाँ प्रेम का सागर कम, और परंपरा का शोर गहरा है।

३. मालिक और गुलाम का खेल

"तू मेरा है, मैं तेरी हूँ"—यह मालिकाना भाव कैसा?

परमात्मा की इस सृष्टि में, यह इंसानी ताव कैसा?

प्रेम में तो विसर्जन है, वहां 'दावा' कहाँ होता है?

शादी के इन बँटवारों में, इंसान स्वयं को खोता है।

एक पिंजरा सोने का हो, तो क्या वह घर कहलाएगा?

बिना स्वतंत्रता के पंछी, क्या कभी गा पाएगा?

विवाह तो एक 'पॉलिसी' है, जो असुरक्षा से जन्मी है,

इसमें सुविधा तो बहुत है, पर चेतना की कमी है।

४. समाधान: मैत्री का मार्ग

शादी के उस पार चलो, जहाँ कोई ज़ंजीर न हो,

जहाँ प्रेम की किताब में, 'हक' की कोई लकीर न हो।

ओशो का संदेश यही—बंधन नहीं, मैत्री को चुनो,

भीड़ के शोर को छोड़कर, अपने भीतर की आवाज़ सुनो।

शादी एक 'मजबूरी' है, और प्रेम एक 'उत्सव' है,

संस्था एक बोझ है, और स्वतंत्रता ही शिवत्व है।

जिस दिन घर मंदिर बनेगा, और प्रेम ही इबादत होगी,

उस दिन किसी 'संस्था' की, फिर न कोई ज़रूरत होगी।


                              - निशांत कश्यप 

Post a Comment

1 Comments